मानवीय संसाधनों की कमी से गाँव क्षेत्रों में जंगलों में लगने वाली आग पर काबू पाना किसी चुनौती से कम नहीं – कृपाल सिंह शीला।
भिकियासैंण। गर्मी के बढ़ने के साथ जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम बात है। आज कल जहाँ देखो वहाँ जंगलों को आग से धधकते आप देख सकते है। आग लगने का सिलसिला जहाँ गर्मी के मौसम में देखने को मिलता था। वहीं जंगलों में आग लगने की घटना अक्टूबर, नवंबर से ही देखने में आ रही है। इसके पीछे का कारण लोगों का रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं व सुख – सुविधा की चाहत में शहरों की ओर पलायन कर जाने से पशुपालन की संख्या में भी कमी हो गई है। जहाँ लोग पशुओं के लिए चारा यानि कि हरी घास को जाड़ों में काटकर उसे धूप में सुखाने के बाद छ: माह के लिए संरक्षित कर लिया जाता था।

आज लोगों द्वारा पशुपालन को सीमित किए जाने से घास काटने की आवश्यकता भी कम हो गई है, जिससे खेतों के किनारे व बंजर भूमि पर सूखी हुई घास वैसी ही रह जाती है। जब कभी लोगों द्वारा खेत के पास काटी झाड़ी को जलाया जाता है या फिर किसी राहगीर द्वारा बीड़ी, सिगरेट जलाने पर जलती माचिस की तीली को जमीन पर फेंक देने से आग धीरे-धीरे जंगलों तक प्रवेश कर जाती है। जंगलों में ये आग फैलकर विकराल रुप ले लेती है जिससे प्रतिवर्ष अरबों-खरबों का नुकसान हो जाने के साथ ही साथ वन संपदा, जड़ी – बूटियाँ, इमारती लकड़ी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, जंगली जानवर, जंगली जानवरों के बच्चे व चिड़ियों के घोंसले, अण्डे व बच्चे झुलसकर मर जाते है।
जंगलों में आग लगने से भीषण गर्मी पड़ जाती है, जिससे तापमान में वृद्धि हो जाने के साथ जलस्रोतों में भी पानी की कमी भी देखी जा सकती है। आजकल गाँव क्षेत्रों में मानवीय संसाधन यानि कि युवा महिला, पुरुषों के न होने से भी जंगलों में लगने वाली आग पर नियंत्रण पाना मुश्किल है। क्योंकि आजकल गाँव घरों में अधिकतर बूढे़ लोग ही रह गए है। जो जंगलों में लगी आग को बुझाने में असमर्थ है। हमारे जंगलों को आग से बचाने के लिए हम सभी को पेड़ों का जीव-जन्तुओं के लिए महत्व को समझ जंगलों में आग न लगाने का संकल्प लेना पड़ेगा। “जंगल हमारे है, हमको ही इन्हें बचाना है”। इस थीम को हमें अपने साथ लागू भी करना है। पर्यावरण प्रेमी कृपाल सिंह शीला की इस ग्राउंड जीरो रिपोर्ट के साथ आओ हम सब मिलकर अपने जंगलों को आग से बचाएं। “वृक्ष है, तो हम है”।



