“अगर बेटा हो, तो भुवन जैसा हो” — माँ के प्रति सच्चे धर्म की मिसाल बने भुवन उपाध्याय।
नौघर, ग्राम पंचायत गैरगाँव, विकासखंड भिकियासैंण के पुत्र ने निभाया आदर्श पुत्र धर्म, पूरे क्षेत्र के लिए बने प्रेरणा।
भिकियासैंण (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड की पावन धरती पर बसे छोटे-से गाँव नौघर, ग्राम पंचायत गैरगाँव, विकासखंड भिकियासैंण की एक साधारण महिला, जिसने अपना पूरा जीवन गाँव की मिट्टी में बिताया, आज पूरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गई है। लेकिन यह कहानी केवल उस माँ की नहीं है, बल्कि उसके पुत्र भुवन उपाध्याय की है, जिसने अपने कर्तव्य और संस्कारों से यह साबित कर दिया कि सच्चा पुत्र कैसा होता है।
भुवन उपाध्याय की माता, जिनकी आयु 82 वर्ष थी, अपने जीवन का अधिकांश समय उत्तराखंड के नौघर गाँव में ही बिताती रहीं। गाँव की सादगी, प्रकृति की गोद और अपने लोगों के बीच उनका जीवन बीता। कुछ समय पहले वह एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली गई थीं। वहां वह करीब तीन महीने तक रहीं और अब वह अपने गाँव लौटने की तैयारी कर रही थीं। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। यह घटना न केवल भुवन उपाध्याय के लिए बल्कि पूरे परिवार के लिए एक गहरा आघात थी। दिल्ली जैसे बड़े शहर में रहते हुए, जहां अंतिम संस्कार के लिए अनेक श्मशान घाट उपलब्ध हैं, वहां किसी के लिए भी यह आसान होता कि वहीं पर अंतिम संस्कार कर दिया जाए। लेकिन भुवन उपाध्याय ने जो निर्णय लिया, वह आज हर किसी के लिए प्रेरणा बन गया है।
भुवन अपनी माँ के इकलौते पुत्र हैं। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय गुजरात और दिल्ली जैसे शहरों में बिताया है। वह गाँव के जीवन से बहुत अधिक परिचित नहीं हैं। गाँव की कठिनाइयां, वहां की दिनचर्या और वहां के रीति-रिवाज उनके लिए कुछ हद तक नए थे। फिर भी उन्होंने यह निश्चय किया कि अपनी माँ का अंतिम संस्कार उसी गाँव में करेंगे, जहां उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया।
भुवन ने अपनी माँ के पार्थिव शरीर को एंबुलेंस के माध्यम से दिल्ली से उत्तराखंड के भिकियासैंण के रामगंगा नदी के त्रिवेणी घाट तक पहुंचाया। यह यात्रा आसान नहीं थी। लंबा सफर, भावनात्मक पीड़ा और अनेक व्यवस्थाओं के बीच उन्होंने यह कठिन निर्णय निभाया। यह केवल एक बेटे का कर्तव्य नहीं था, बल्कि अपनी माँ के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक था।
गाँव नौघर में जब माँ का पार्थिव शरीर पहुंचा, तो पूरा गाँव शोक में डूब गया। हर किसी की आँखें नम थी। गाँव के बुजुर्गों और युवाओं ने एक स्वर में कहा कि भुवन ने जो किया है, वह आज के समय में बहुत कम देखने को मिलता है। गाँव के लोग कहने लगे, “अगर बेटा हो तो भुवन जैसा हो।”
आज के आधुनिक समय में, जहां लोग अपनी व्यस्त जिंदगी में इतने उलझे रहते हैं कि अपने माता-पिता के लिए समय निकालना भी मुश्किल हो जाता है, वहां भुवन उपाध्याय का यह कदम समाज के लिए एक आईना है। आज कई ऐसे माता-पिता हैं जो वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर हैं। उनके बच्चे उनसे महीने में एक बार या कभी-कभी ही मिलने जाते हैं। ऐसे समय में भुवन का यह निर्णय न केवल सराहनीय है, बल्कि एक संदेश भी देता है कि माता-पिता के प्रति हमारा कर्तव्य क्या होना चाहिए।
भुवन उपाध्याय एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। उनकी नौकरी की जिम्मेदारियां काफी हैं। उनके लिए इतना लंबा समय निकालना और गाँव में रहकर सभी रस्में निभाना आसान नहीं है। गाँव की परिस्थितियां, वहां की जीवनशैली, यहां तक कि बिना चप्पल के चलना भी उनके लिए एक चुनौती थी। लेकिन उन्होंने इन सभी कठिनाइयों को नजरअंदाज कर केवल अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी।
वें गाँव में रहकर अपनी माँ के सभी अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कर रहे है। हर परंपरा का पालन कर रहे है, हर रीति को सम्मान दे रहे है। यह केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव का प्रमाण था। उन्होंने यह दिखा दिया कि संस्कार और भावनाएं किसी भी सुविधा या कठिनाई से बड़ी होती हैं।
इस पूरे सफर में उनकी सुसंस्कारवान पत्नी जानकी ने भी उनका पूरा साथ दिया। उन्होंने हर कदम पर भुवन का समर्थन किया और उनके साथ गाँव में रहकर सभी जिम्मेदारियां निभाईं। आज के समय में, जहां पति-पत्नी दोनों अपने-अपने करियर में व्यस्त रहते हैं, वहां इस तरह का सहयोग भी अपने आप में एक उदाहरण है। भुवन की पत्नी ने यह साबित किया कि एक सशक्त परिवार वही होता है, जहां हर सदस्य एक-दूसरे के साथ खड़ा रहता है।
गाँव के लोगों ने भुवन और उनकी पत्नी की जमकर सराहना की। हर कोई उनके इस निर्णय से प्रभावित हुआ। बुजुर्गों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और युवाओं के लिए उन्हें एक आदर्श बताया। गाँव में कई दिनों तक इसी विषय पर चर्चा होती रही कि आज के समय में भी ऐसे बेटे और बहू हैं, जो अपने संस्कारों को नहीं भूलते।
यह घटना केवल एक परिवार की नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को निभा पा रहे हैं? क्या हम उनके लिए उतना समय निकाल पा रहे हैं, जितना उन्होंने हमारे लिए निकाला था?
भुवन उपाध्याय की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, माता-पिता के प्रति हमारा कर्तव्य सबसे पहले होना चाहिए। उन्होंने यह दिखाया कि सच्चा प्रेम और सम्मान शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में दिखता है।
आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं, ऐसे समय में भुवन जैसे लोग हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हमारी असली पहचान हमारे संस्कारों में है।
भुवन उपाध्याय ने जो किया, वह शायद उनके लिए एक सामान्य कर्तव्य रहा हो, लेकिन समाज के लिए वह एक प्रेरणा बन गया है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक सच्चा बेटा वही होता है, जो अपने माता-पिता के सम्मान और उनकी इच्छाओं को सर्वोपरि रखता है।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि भुवन उपाध्याय जैसे लोग ही हमारे समाज की असली ताकत हैं। उनके जैसे बेटे हर घर में हों, यही हर माता-पिता की इच्छा होती है। और शायद इसी भावना के साथ गाँव के लोग आज भी कहते हैं — “अगर बेटा हो, तो भुवन जैसा हो।”
रिपोर्टर – रिया सोलीवाल










