घर में बैठकर जेआरएफ की रेवड़ी खा रहे छात्र, शिक्षक बने है मूकदर्शक।
हल्द्वानी। यूजीसी ने फेलोशिप स्कीम के तहत जूनियर रिसर्च फेलोशिप, सीनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए मिलने वाली राशि में बड़ा बदलाव किया जिसने जेआरएफ में 37 हजार और एसआरएफ में 42 हजार रु. प्रति माह कर दी, ताकि देश में अनुसंधान के कार्य में छात्र – छात्राओं को सहायता मिले और नवाचार को बढ़ावा मिले, परंतु इसके विपरित छात्र, अपने प्राध्यापकों की सहायता से इसका गलत फायदा उठा रहे है, फेलोशिप प्राप्त करने वाले अधिकतम छात्र कॉलेज या प्रयोगशालाओं के दर्शन तक नहीं करते, तो कई छात्र अपने पहुंच से शोध गाइड और ऑफिस स्टाफ की सहायता से स्कॉलरशिप का पैसा घर बैठ कर उड़ा रहे है, यूजीसी के मानकों में प्रतिदिन शोध के 2 घंटे आवंटित है लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं, कई प्राध्यापक अपने जेआरएफ एसआरएफ छात्र – छात्राओं की एक साथ उपस्तिथि पंजीकाओ में हस्ताक्षर करवा रहे है और इस गलत कार्य हेतु उनकी सहायता करते है।
सरकार लगातार शोध और नवाचार को प्राथमिकता दे रही है, वही फेलोशिप का इस तरह उपयोग होना बहुत बड़ी चिंता और जांच दोनो का विषय है, फेलोशिप के नियमों में एक प्रमुख नियम है कि प्रत्येक छ: महीने में विभाग प्रमुख और शोध सुपरवाइजर को छात्र की प्रोग्रेस रिपोर्ट चेक करने का प्रावधान है लेकिन इन नियमों को भी ताक पर लगाया हुआ है, एक वर्ष में मात्र 30 दिन के अवकाश जेआरएफ छात्रों को देय है परन्तु छात्र इन नियमों से निर्भीक है और लगातार इनकी अनदेखी करते है, मेडिकल, एचआरए, कंटिंगेंसी डिपार्टमेंट एसिस्टेंस आदि जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं प्रदान की जाती है परन्तु इसके परिणाम स्वरुप इनकी शोध समीक्षा के लिए कोई टीम कार्य नहीं कर रही है, कई महाविद्यालयों में शिक्षक एक साथ अपने शोध छात्र – छात्राओं से एक साथ उपस्तिथि पंजिका में हस्ताक्षर करवा कर उनको फेलोशिप दिलवाने में अहम भूमिका अदा करते है और इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं हैं।



