सभी पत्रकार बंधुओं को “हिंदी पत्रकारिता दिवस” की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

कुन्दन, संवाददाता। हिंदी पत्रकारिता के योगदान को सराहने और पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए हर साल हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। कहते है समाज को आइना दिखाने का काम पत्रकार करते हैं। पत्रकारिता (Journalism) में देश और समाज के मुद्दों, घटनाओं और समाचारों को देशभर के लोगों तक पहुंचाया जाता है और उन्हें अवगत कराने की कोशिश की जाती है। ताकतवर देश की सफलता-विफलता वहां की पत्रकारिता तय करती है। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता ही लोकतंत्र को मजबूत करती है। ना तीर निकालो ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। लोकतंत्र की सफलता या विफलता उसके पत्रकारिता पर आधारित रहता हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि “प्रेस आधुनिक जीवन के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है, खासकर लोकतंत्र में प्रेस के पास जबरदस्त शक्तियां और जिम्मेदारियां हैं। प्रेस का सम्मान किया जाना चाहिए और उसका सहयोग भी। प्रकाशन एक व्यवसाय है, लेकिन पत्रकारिता कभी व्यवसाय नहीं थी और आज भी नहीं है और न ही यह कोई पेशा है और मेरा मानना है कि अच्छी पत्रकारिता, अच्छा टेलीविजन हमारी दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकता है।

लगभग दो शताब्दी पूर्व ब्रिटिश कालीन भारत में जब तत्कालीन हिन्दुस्तान में दूर – दूर तक मात्र अंग्रेजी, फ़ारसी, उर्दू एवं बांग्ला भाषा में अखबार छपते थे, तब देश की राजधानी “कलकत्ता” में “कानपुर” के रहने वाले वकील पण्डित जुगल किशोर शुक्ल जी ने अंग्रेजों की नाक के नीचे हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की आधारशिला रखी, जिस पर आज आप सभी ने भव्य भवन खड़े किए है। उस आधारशिला का नाम था “उदन्त मार्तण्ड, जिसने अंग्रेजों की नाक में इस कदर खुजली कर दी कि उसका प्रकाशन डेढ़ वर्ष से अधिक न हों सका। इस साप्ताहिक के प्रकाशक एवं सम्पादक आदरणीय शुक्ल जी ने 30 मई 1826 को “उदन्त मार्तण्ड” का पहला अंक प्रकाशित किया था, जिसके परिप्रेक्ष्य में 30 मई का दिन हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव कहलाया, और हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस बनाते है। प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होने वाले इस साप्ताहिक अखबार में “उदन्त मार्तण्ड” में हिन्दी भाषा के “बृज” और “अवधी” भाषा का मिश्रण होता था। पत्र वितरण में अंग्रेजों द्वारा लगातार डाक शुल्क में छूट न दिये जाने के कारण इसका 79वाँ और आखिरी अंक दिसम्बर 1827 में प्रकाशित हुआ। इस समाचार पत्र के पहले अंक की 500 प्रतियाँ प्रकाशित हुई थी।

रिपोर्टर- एस. आर. चन्द्रा भिकियासैंण

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