बहुभाषी मासिक साहित्यिक संगोष्ठी दिल्ली में कृपाल सिंह शीला को मिला साहित्य सम्मान।

भिकियासैंण (अल्मोड़ा)। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर गढ़वाल भवन, दिल्ली में बहुभाषी मासिक साहित्यिक संगोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसमें सुदूर तहसील भिकियासैंण, जिला अल्मोड़ा से आमंत्रित शिक्षक एवं नवाचार के अभिप्रेरक कृपाल सिंह शीला को तृतीय साहित्य सम्मान प्रदान किया गया।

विगत दिसंबर में कमल रावत को उनके सुप्रसिद्ध ‘देवलगढ़’ उपन्यास के लिए तथा जनवरी में डॉ. कुसुम भट्ट को ‘मौरु मंडाण’ मुखौटा नाट्य संस्कृति में उत्कृष्ट कार्य हेतु सम्मानित किया जा चुका है।

कार्यक्रम का शुभारंभ और प्रथम सत्र:
श्रीलगुळि मनीप्लांट के सान्निध्य में जगमोरा के ग़ज़ल गीत ‘खोली का गणेशा’ तथा राजेंद्र कुकरेती के गीत ‘जय उत्तराखंड’ के साथ आयोजन का शुभारंभ हुआ।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में जनवरी माह के ऐतिहासिक ‘बहुभाषा काव्य कौथिक’ की सफलता पर सुशील बुड़ाकोटी ‘शैलांचली’ ने 20 साहित्यप्रेमियों की टिप्पणियों का वाचन किया।

व्यंग्यकार सुनील थपलियाल ‘घंजीर’ ने इसे ‘कवियों की अग्नि-परीक्षा’ बताते हुए कहा कि जिन कवियों के लिए लाल किला एक सपना मात्र है, उन्हें अब निराश होने की आवश्यकता नहीं है। पजलगढ़ के पजलपति, पजल सम्राट जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ उनके सपनों को मंच देने के लिए तैयार हैं।

व्यंग्यकार संदीप घनशाला गढ़वाली ने इसे ‘कवि कौथिक’ की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि आयोजन से गढ़वाल भवन के आँगन में बिछी टाइल्स तक खुशी से चमक रही थीं। सामान्य व्यक्ति से लेकर जाने-माने कवि तक उपस्थित रहे। कुछ लोग जगमोरा की पजल पढ़कर लेखन की ओर आकर्षित हुए।

कोरोना काल में भी दूधबोली भाषा को बचाने की मुहिम थमी नहीं। जगमोहन सिंह रावत ने पजल औखाण विधा को गढ़वाली भाषा में काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। अब तक वे 1200 पजल लिख चुके हैं और साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में पजलकार के रुप में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं।

साहित्यकारों के संदेश और विचार:
राजेंद्र कुकरेती ने संदेश भेजते हुए कहा कि भले ही वे शारीरिक रुप से उपस्थित न हो सके, परंतु कार्यक्रम की मधुर गूंज सोशल मीडिया के माध्यम से उन तक पहुंच गई।

डॉ. हेमा जोशी ‘हिमाद्रि’ ने कहा कि जगमोरा पजल सम्राट का व्यवहार जितना सरल और सहज है, उनकी लेखनी उतनी ही दमदार है। उन्होंने अपनी दो पुस्तकों के विमोचन को विशेष बताया।

द्वितीय सत्र: ‘घार-बूण’ कहानी संग्रह पर चर्चा:
दूसरे सत्र में दर्शन सिंह रावत के गढ़वाली कहानी संग्रह ‘घार-बूण’ पर सार्थक चर्चा हुई। मुख्य वक्ताओं में जयपाल सिंह रावत, चंदन प्रेमी, दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’, जबर सिंह कैंतुरा, जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’, दिनेश ध्यानी, निर्मला नेगी, गोविंद राम पोखरियाल ‘साथी’, द्वारिका प्रसाद चमोली और संदीप घनशाला गढ़वाली शामिल रहे।

दर्शन सिंह रावत ने कहा कि लगभग 65 से अधिक साहित्यकारों के बीच इतनी गहन समीक्षा पहली बार देखने को मिली, जिससे उन्हें आगे लेखन की प्रेरणा मिली।

तृतीय सत्र: कृपाल सिंह शीला सम्मानित:
संगोष्ठी के तृतीय सत्र में कृपाल सिंह शीला को अंगवस्त्र, पत्रम्-पुष्पम् एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

परिचय गढ़वाली में डॉ. सतीश कालेश्वरी तथा कुमाउनी में चारु तिवारी ने दिया। प्रशस्ति पत्र पर कुसुम जगमोरा (अपर निदेशक, से.नि., लोकसभा सचिवालय), सुधीर सुन्द्रियाल (संस्थापक, फील्ड गुड), डॉ. पीताम्बर अवस्थी (शिक्षाविद, पर्यावरणविद्) तथा कुलानंद जोशी, आईएएस (से.नि.) के हस्ताक्षर रहे।

प्रशस्ति पत्र में उल्लेखित है कि फरवरी 2026 में मासिक साहित्यिक संगोष्ठी दिल्ली द्वारा कृपाल सिंह शीला, ग्राम सरपटा, डाकखाना बासोट, जिला अल्मोड़ा (उत्तराखंड), वर्तमान में रा.जू.हा. मुनियाचौरा, भिकियासैंण में विज्ञान शिक्षक, को गढ़वाली और कुमाउनी लोकभाषा, साहित्य, संस्कृति, सामाजिक सरोकार एवं पर्यावरण संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान हेतु सम्मानित किया गया।

सन 1978 में जन्मे शीला की प्रारंभिक शिक्षा चनूली, श्रीकोट, बासोट और भिकियासैंण में हुई। उन्होंने बीएससी रानीखेत महाविद्यालय, एमएससी कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल तथा बीएड चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से किया।

वे पठन-पाठन, लेखन, चित्रकारी, गायन एवं खेलकूद में विशेष रुचि रखते हैं। नशामुक्ति, वृक्षारोपण, बाल विकास, भाषा विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर उनके अभियान जारी हैं। पिछले नौ वर्षों से वे ‘गिरै कौतिक’ का सफल आयोजन कर रहे हैं।

उन्हें भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय से ‘शिक्षा में शून्य निवेश’ विषय पर राष्ट्रीय स्तर तथा मतदाता दिवस पर राज्य स्तर का पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उनकी ‘गिरै कौतिक’ कविता-पुस्तक प्रकाशित है तथा उनके लेख आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रसारित/प्रकाशित होते रहे हैं।

अष्टधाम जातरा की घोषणा:
‘हजार ग्राम हजार धाम, हमरी भाषा हमरी पछ्याण’ के संदेश के साथ जगमोरा ने 20–22 फरवरी 2026 को नौड़ी से पौड़ी (राठ क्षेत्र, पौड़ी गढ़वाल) तक अष्टधाम जातरा की घोषणा की।

मुख्य पड़ाव नौड़ी, एसएनजे दून पब्लिक स्कूल त्रिपालीसैंण, मजरा महादेव (अर्द्धनारीश्वर धाम), चौंरा, बांजकोट, चाकीसैंण, चित्रेश्वर महादेव, चिपलघाट, राहू मंदिर पैठाणी, राठ महाविद्यालय पैठाणी, कंडोलिया, पौड़ी रहेंगे।

पजल जातरी के रुप में जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’, सुशील बुड़ाकोटी ‘शैलांचली’, इंद्रजीत सिंह रावत, कल्याण सिंह, भूपेंद्र सिंह बिष्ट, सतीश रावत और विनोद गौड़ शामिल रहेंगे।

पजल विधा की विशेषता:
पजल काव्य शैली में आठ-आठ पंक्तियों के चार चरण (कुल 32 पंक्तियां) होते हैं। पहले चरण में भूमिका, दूसरे में विस्तार, तीसरे में दुविधा और अंतिम में प्रश्न पूछा जाता है। उत्तर पजल के भीतर ही निहित होता है और अंत में चार विकल्प दिए जाते हैं।

काव्य पाठ और उपस्थिति:
अंतिम सत्र में आशा रौतेला मेहरा, चंदा फुलारा, अनूप सिंह रावत, प्रदीप रावत ‘खुदेड़’, रमेश चंद्र सोनी, संतोष कुमार ध्यानी, दयाल सिंह नेगी, उमेश बन्दूणी, सुरेंद्र सिंह रावत, मंगतराम धस्माना, ललिता राणा, अंजली भंडारी, त्रिलोक सिंह कड़ाकोटी, नीलू सती, गिरधारी सिंह रावत, श्याम सुंदर कड़ाकोटी, बीर सिंह राणा, डॉ. सतीश कालेश्वरी और डॉ. राम निवास ‘इंडिया’ की प्रस्तुतियां रहीं।

मंच संचालन सुशील बुड़ाकोटी ‘शैलांचली’ और बृजमोहन शर्मा वेदवाल ने किया।

संगोष्ठी में रोशन लाल ‘हिंद कवि’, दीप नारायण सिंह भंडारी, बहादुर सिंह बिष्ट, शशिकांत बडोला, कुंवर सिंह बिष्ट, पयाश पोखड़ा, डॉ. बिहारी लाल जलंधरी, हरीश गैरोला, सुनील थपलियाल ‘घंजीर’, खजान दत्त शर्मा, गरिमा राणा, सुल्तान सिंह तोमर, टेकचंद, जगदीश, रोशनी रावत, सुरेंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह रावत, सागर पहाड़ी, युगराज सिंह रावत, ओम ध्यानी, इंद्रजीत सिंह रावत, प्रताप थलवाल, रविंद्र गुडियाल, चंद्र सिंह रावत ‘स्वतंत्र’, दिनेश चंद्र जोशी, सोम प्रकाश, सुरेंद्र कुमार जुयाल, कैलाश कुकरेती सहित अनेक साहित्यप्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का समापन पंचमेवा, नारियल, रोट एवं होली गीतों के साथ हुआ।

रिपोर्टर – रिया सोलीवाल

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