महंगाई, बेरोज़गारी और आपदाओं से जूझते उत्तराखंड को बजट से मिली निराशा।
भिकियासैंण (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने केंद्रीय बजट 2026 को आम नागरिकों की ज़मीनी ज़रुरतों और उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्यों की तात्कालिक समस्याओं के प्रति संवेदनहीन, दिशाहीन और निराशाजनक करार दिया है।
पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पी.सी. तिवारी ने कहा कि लगातार बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत के बावजूद आयकर स्लैब में कोई राहत न दिया जाना यह दर्शाता है कि यह बजट मध्यम वर्ग, वेतनभोगियों और छोटे व्यवसायों पर बढ़ते आर्थिक दबाव को पूरी तरह नजरअंदाज़ करता है।
उन्होंने कहा कि बजट के तुरंत बाद शेयर बाजार में आई तेज गिरावट यह स्पष्ट संकेत है कि निवेशकों ने भी इस बजट पर भरोसा नहीं जताया है। फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर एसटीटी बढ़ाने का फैसला बाजार की तरलता को नुकसान पहुँचाएगा और खुदरा निवेशकों को हतोत्साहित करेगा, जिससे पूंजी बाजार और अधिक अस्थिर होगा।
हालांकि बजट में पूंजीगत व्यय और विनिर्माण पर ज़ोर देने की बात कही गई है, लेकिन रोजगार सृजन को लेकर कोई ठोस, समयबद्ध और मापनीय रोडमैप पूरी तरह नदारद है। विशेष रुप से शिक्षित युवाओं के लिए यह बजट केवल आश्वासनों का पुलिंदा बनकर रह गया है।
उत्तराखंड के संदर्भ में इस बजट को और भी अधिक निराशाजनक बताते हुए पी.सी. तिवारी ने कहा कि राज्य लगातार भूस्खलन, भू-धंसाव, बाढ़ और बादल फटने जैसी गंभीर आपदाओं से जूझ रहा है, इसके बावजूद एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के लिए कोई विशेष या अतिरिक्त प्रावधान न किया जाना केंद्र सरकार की घोर उदासीनता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि राज्य के लिए न तो कोई समर्पित रोजगार पैकेज है, न उद्योग-आधारित योजना और न ही युवाओं के लिए कोई ठोस हस्तक्षेप, जिससे पहाड़ों से पलायन और तेज़ होना तय है।
पर्यटन क्षेत्र को लेकर भी बजट को निराशाजनक बताते हुए उन्होंने कहा कि चारधाम, गढ़वाल और कुमाऊँ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए अलग से सुनिश्चित बजट, पर्यावरण संरक्षण, आपदा सुरक्षा और स्थानीय रोजगार से जुड़ी कोई स्पष्ट नीति प्रस्तुत नहीं की गई है। इसी तरह पहाड़ी कृषि और बागवानी के लिए न तो मूल्य समर्थन, न परिवहन व्यवस्था, न कोल्ड-चेन और न ही बाज़ार तक पहुँच सुनिश्चित करने की कोई पहाड़ी-विशेष रणनीति दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि यह बजट भले ही कागज़ों में वित्तीय स्थिरता की बात करता हो, लेकिन उत्तराखंड के लिए यह आपदाओं पर मौन, रोजगार पर अस्पष्टता और पहाड़ी युवाओं के भविष्य पर गहरी अनिश्चितता का दस्तावेज़ है।
रिपोर्टर – रिया सोलीवाल



















