पर्यावरण संरक्षण के लिए खाद्य पदार्थों के रैपर के माध्यम से पढ़ने को कर रहे नवाचारी प्रयास।

भिकियासैंण। हमारे पर्यावरण को अजैविक कचरे के रुप में नुकसान पहुँचाने वाले विभिन्न प्रकार के पॉलिथिन व रैपर अहम भूमिका में हैं। ये पॉलिथिन व रैपर जमीन में हजारों सालों तक पड़े रह सकते हैं। जमीन के नीचे गड्ढों में दबाने पर भी ये नष्ट नहीं होते, वैसे के वैसे ही रहते हैं। जो जल प्रदूषण व मृदा प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं, और इनको जलाने पर ये विषाक्त गैसें छोड़ते हैं। जो कि पर्यावरण को वायु प्रदूषण के रुप में दूषित करने का काम करते हैं।

भिकियासैंण विकासखण्ड के शिक्षक कृपाल सिंह शीला सहायक अध्यापक विज्ञान राजकीय जूनियर हाईस्कूल मुनियाचौरा द्वारा इन प्लास्टिक के रैपरों से बाजार व रास्तों को आप रंग-बिरंगा देख सकते हैं। जाड़े के मौसम के शुरुआत में अक्टूबर माह से मेरे दिमाग में एक नवाचार आया कि विभिन्न खाद्य पदार्थों की पैंकिंग में उपयोग किए गए इन रंगीन रैपरों का क्या उपयोग हो सकता है, जिससे हमारे पर्यावरण का नुकसान भी न हों और बाजार, रास्ते भी इन रंग-बिरंगे रैपरों से न पटे रहें। मैंने देखा कि इन खाद्य पदार्थों को खाने वालों की अधिकतर संख्या स्कूलों के बच्चों की थी। मैंने देखा कि बच्चों को आकर्षित करने वाले ये अधिकतर रंगीन रैपर ओयस, चैक इट, मन्चूरियन, मंच, पोला पापड़, कुरकुरे, पाश्ता, चिप्स, सतमोला, अप्पू का जू, सुपर सेवर पैक, जंगल सफारी, ऑल इन वन, मोटू- पतलू, नूडल्स चटपटा, आलू की भुजिया, नट क्रेकर्स, विभिन्न बिस्कुटों पारले-जी, मैरीगोल्ड, बटर बाइट, गुड-डे, क्रेक्स आदि के हैं।

मैं विगत पाँच माह से इन रैपरों को जमा कर एक दिन में दो-तीन रैपरों का उपयोग अंगीठी व चूल्हे में आग जलाने के लिए करता हूँ। ये पहले समय में आग जलाने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले मिट्टी का तेल, लीसायुक्त चीड़ व भीमल के छिलुक के विकल्प के रुप में हैं। दिनभर में दो-तीन रैपर को जलाए जाने से पर्यावरण को कोई ज्यादा नुकसान न पहुँचने के साथ ही जमीन पर बिखरे अजैविक कचरे से भी हमको निजात मिल सकेगा। दूसरा इन रैपरों का उपयोग हम बच्चों को अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर पढ़ने व लिखने के लिए कर सकते हैं। इन रैपरों पर अंग्रेजी के शब्दों को बहुत आकर्षक रुप में अलग-अलग रंगों में लिखा होता है। इन रैपरों को हम एक प्लास्टिक के कट्टे पर सुई से सिलकर दीवार पर लटकाने के लिए एक फोल्डिंग बोर्ड जैसा बना सकते हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी लोगों, स्कूली बच्चों से एक अपील की है कि वे इस प्रकार के फास्ट फूड, जंक फूड का उपयोग ना करें। ये हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं। टीएलएम व अन्य प्रयोजनों में पुन: उपयोग के माध्यम से भी काफी हद तक हम पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। जब हमारा पर्यावरण स्वच्छ रहेगा, तभी हम सब भी स्वस्थ रह पाएंगे।

रिपोर्टर- एस. आर. चन्द्रा भिकियासैंण

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *