पहाड़ की सड़कों में होने वाली दुर्घटनाओं के लिए शासन-प्रशासन है जिम्मेदार।

भिकियासैंण (अल्मोड़ा)। जनपद के सल्ट क्षेत्र में हुई बस दुर्घटना ने अनेक घरों के दीपक बुझा दिए, अनेक माताओं की कोख सूनी कर दी, कई नौनिहालों को अनाथ बना दिया, कई बुजुर्गों के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया, आखिर इसका जिम्मेदार कौन है ?

आज सरकारी महकमों में अतीत की असंख्य दुर्घटनाओं की तरह कुछ मुआवजा देकर संवेदनाएं व्यक्त कर दी जाएंगी, लेकिन फिर वहीं पूर्व का रव्वया चलता रहेगा। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के वरिष्ठ नेता एडवोकेट राकेश बिष्ट ने कहा कि इस दर्दनाक सल्ट के मरचूला में सड़क हादसा में 36 लोगों की मौत व 26 गंभीर रुप से घायल हो गए, लेकिन आज इसका जिम्मेदारी कौन लेगा, शासन या प्रशासन।

इसके लिए कुछ हद तक दृढ़ इच्छा शक्ति होने पर सरकार नियंत्रण कर सकती है। सड़कों को गड्ढामुक्त करना चाहिए, और उत्तराखण्ड की लचर परिवहन व्यवस्था पर सरकार को मजबूती से हाथ डालने चाहिए। सभी बस यूनियनों पर लगाम लगाने की जरुरत है। परिवहन मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री जी से निवेदन है कि सभी यूनियनों की बसों का अधिग्रहण कर उत्तराखंड परिवहन निगम के बीड़े में डालकर किलोमीटर स्कीम के तहत चलाया जाएं। इनमें बस मालिक का ड्राइवर हों और कंडक्टर परिवहन विभाग का होना चाहिए, जिसका ओवरलोडिंग आदि पर नियन्त्रण होना चाहिए। कुछ निजी बस वालों की मनमानी ऐसी है कि सवारियों को टिकट नहीं देते है। कम्पनी को भी चूना लगा रहे है। वैसे भी जितने टिकट कटते है, उनका मात्र 4% ही केएमओ या अन्य कंपनियों को जाता है, शेष मालिक या कंडक्टर का ही होता है।

पहाड़ों में चलने वाली गाड़ियों में ओवरलोडिंग कौन देख रहा है?
कुमाऊं के पर्वतीय इलाकों में सड़क हादसों का सिलसिला जारी है। यहां इन हादसों की खास वजह सड़कों की सीमित चौड़ाई, बेहद संकरापन और वाहन चालकों की लापरवाही भी है। विगत सोमवार सुबह अल्मोड़ा जिले के मरचूला में बस खाई में गिरने से 36 यात्रियों की जान चली गई। लोग इसके लिए सड़क के संकरा होने को जिम्मेदार मान रहे है। लोगों का कहना है कि जिस जगह से बस खाई में गिरी, वहां एक तो तीखा मोड़ है, इसके अलावा अगर एक साथ आमने-सामने दो बड़े वाहन आ जाएं तो इस स्थान पर पास देने तक के लिए जगह नहीं होती है। आपदा प्रबंधन के आंकड़ों के मुताबिक, अल्मोड़ा, चम्पावत, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में इस साल अब तक 60 सड़क हादसों में 71 लोगों की मौत हो चुकी है। अल्मोड़ा में 11 महीने में 44 की जान गई है। ऐसे ही कई लोगों की जान चली गई। आज ओवरलोडिंग भी हादसे का बड़ा कारण बन रहा है। जगह -जगह मोड़ पर सड़क किनारे पैराफिट भी नहीं बना है। रोज हो रहे ऐसे हादसे से शासन-प्रशासन को सबक सीखना होगा।

वहीं आम आदमी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष व क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता नन्दन सिंह बिष्ट ने भी इस दर्दनाक सड़क दुर्घटना की जिम्मेदार विभागीय तंत्र को बताया है। उन्होने कहा आज पहाड़ों की रोडे पूरी तरह जान जोखिम में डालने जैसी हो गई है। शासन – प्रशासन को इस ओर सख्ती से पेश होना होगा, और ओवर लोडिंग व अन्य नियमों का पालन करवाना होगा।

रिपोर्टर- एस. आर. चन्द्रा भिकियासैंण

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